Monday , January 30 2023

Sawal To Banta Hai: लगातार तीन चुनाव हार गये अखिलेश यादव, क्या अब चलेंगे मुलायम की राह या फिर दोहराएंगे पुरानी गलतियां?

लखनऊ. Sawal To Banta Hai- रामचरित मानस में सुंदरकांड के 37वें दोहे में लिखा है- सचिव, बैद्य, गुरु तीनि जो प्रिय बोलहिं भय आस, राज-धर्म, तन तीनि कर होई बेगही नास। क्या अखिलेश यादव के साथ इस बार कुछ ऐसा ही हुआ है? या फिर वह सब कुछ देखते हुए भी समझ नहीं पाये? क्यों नहीं उन्होंने अपने पिता मुलायम का विनिंग फॉर्मूला अपनाया? अब 2024 में क्या होगा? क्या हार से सबक लेते हुए अखिलेश यादव पुरानी गलतियां दोहराने से बचेंगे? सवाल ये भी है कि क्या अखिलेश यादव सपा को संभाल पाएंगे? सवाल कई हैं, जिनके जवाब भविष्य के गर्त में छिपे हैं।

2017 और 2019 के बाद अब 2022 में भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी को लगातार तीसरी बार चुनाव हरा दिया है। नतीजों से पहले तमाम राजनीतिक पंडित और ग्राउंड रिपोर्ट का दावा करने वाले इस बार सपा की जीत के प्रति आश्वस्त थे। उनका दावा था कि दोनों दलों के बीच बमुश्किल 10-15 सीटों का ही अंतर होगा, लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि सपा गठबंधन 125 सीटों पर ही सिमट गया?

गलत कैंडिडेट सिलेक्शन सपा की हार का बड़ा कारण?
राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि यूपी में इस बार समाजवादी पार्टी के पक्ष में माहौल था। लेकिन, सपा प्रमुख अखिलेश यादव के फैसलों और भारतीय जनता पार्टी की आक्रामक रणनीति व धुआंधार चुनाव प्रचार ने बाजी पलट दी। कैंडिटेट सिलेक्शन से लेकर चुनावी मैनेजमेंट में अखिलेश यादव बीजेपी से कमतर साबित हुए हैं। तमाम जानकारों का मानना है कि सपा की हार का एक बड़ा कारण कैंडिडेट सिलेक्शन भी है। करीब चार दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी थीं जिन पर अगर सही कैंडिडेट को टिकट दिया गया होता तो नतीजा कुछ और होता। इस बार यूपी की 403 में से 305 सीटों पर सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर थी। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कई सीटें ऐसी रहीं जिन पर जीत और हार का मार्जिन 5 हजार वोटों से भी कम रहा, कुछ पर तो यह अंतर 1,000 से 2,000 के बीच सिमट गया। जबकि करीब 15 सीटों पर प्रत्याशियों की जीत हार का अंतर 1,000 वोट से भी कम रहा। इसके अलावा कई सीटें ऐसी थीं जहां सपा मुख्य मुकाबले में थी, लेकिन गलत कैंडिडेट सिलेक्शन की वजह से पार्टी तीसरे नंबर पर पहुंच गई।

चुनावी कैंपेन में इक्कीस साबित हुई भाजपा
अब बात कर लेते हैं समाजवादी पार्टी और भाजपा के चुनावी कैंपेन की… पीएम मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा सहित भाजपा के करीब दो दर्जन दिग्गज नेता चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक रहे थे वहीं, अखिलेश यादव अकेले दम पर प्रदेश को मथ रहे थे। ऐसे में सवाल तो बनता है? कि क्या अखिलेश यादव के अलावा सपा में कोई ऐसा नेता था? जिसने अपनी रैली से लोगों का ध्यान खींचा हो?

अखिलेश के सामने थी बीजेपी की फौज
उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव के बीच ही था। अखिलेश अकेले ही प्रदेश को मथ रहे थे, जबकि योगी के साथ महारथियों की फौज थी। दो चरणों तक अखिलेश को जयंत का साथ जरूर मिला, बाकी में वह अकेले ही विधानसभा क्षेत्रों को मथ रहे थे। उदाहरण के लिए अगर 10 जिलों में चुनाव प्रचार होता तो बीजेपी के 20 बड़े नेता चुनाव प्रचार में जुटे थे, जबकि सपा की ओर से सिर्फ अखिलेश यादव ही दिखाई देते थे। इसका मतलब यह नहीं है कि सपा की ओर से लोगों ने चुनाव प्रचार नहीं किया। सपा की ओर से भी तमाम नेता चुनाव प्रचार में लगे थे, लेकिन बीजेपी के मुकाबिल वह कहीं नजर नहीं आ रहे थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी में ऐसे नेताओं की भी कमी है जो अखिलेश की अनुपस्थिति में स्थितियों से निपट सकते हैं या फिर किसी भी तरह के राजनीतिक संकट को संभाल कर पार्टी की छवि को नुकसान नहीं होने देते। दूसरी ओर, भाजपा के पास स्टार प्रचारकों की पूरी फौज है जो पूरी दम से चुनाव प्रचार में जुट जाते हैं। भाजपा के मुकाबले संगठन भी काफी कमजोर नजर आया। खुद अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह यादव मानते हैं कि पूरे चुनाव के दौरान सपा का संगठन कहीं नजर नहीं आया।

बीजेपी के जाल में उलझ गये अखिलेश यादव?
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस चुनाव में अखिलेश यादव पूरी तरह से बीजेपी की रणनीति में उलझ कर रह गये। उन्होंने अपनी पूरी ताकत बीजेपी को जवाब देने में ही लगा दी। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने न तो परिवार की मदद ली और न ही सहयोगियों की। मुलायम सिंह यादव की ताकत उनका परिवार ही था, लेकिन इस चुनाव में बीजेपी के परिवारवाद के आरोपों से बचने के लिए अखिलेश ने परिवार से ही किनारा कर लिया। न तो उन्होंने चाचाओं को चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी और न ही परिवार के दूसरे सदस्यों को पैन यूपी में कैंपेनिंग में लगाया। हां, डिंपल यादव ने कई रैलियों में जरूर कैंपेनिंग की।

क्या अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है?
सवाल तो बनता है कि यूपी में 400 सीटें जीतने का दावा करने वाला सपा गठबंधन 125 सीटों पर ही कैसे सिमट गया? सपा के पक्ष में बना माहौल अखिलेश यादव भुना क्यों नहीं पाये? क्या अखिलेश के अलावा सपा में और नेता नहीं हैं जो वोट लाने में कामयाब होते? अगर हैं तो फिर उन्हें पूरी तरह से इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? क्या अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है?

मुलायम से अलग हैं अखिलेश के राजनीतिक तौर-तरीके
अखिलेश की लगातार तीसरी हार के बाद अब सपा के कई नेता खुलकर कहने लगे हैं कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की राजनीति के तौर-तरीके बिल्कुल अलग हैं। मुलायम तमाम जातीय व क्षेत्रीय आधार वाले तमाम नेताओं को साथ लेकर चलते थे जैसे- बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान, जनेश्वर मिश्र, भगवती सिंह आदि। जबकि अखिलेश खुद ही अकेले ही चुनाव प्रचार करते नजर आये। यहां तक कि चाचा शिवपाल यादव को भी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी। न ही सहयोगी को दलों को चुनाव प्रचार में भागीदार बनाया। सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़े महान दल के मुखिया केशव देव मौर्य कहते हैं कि अखिलेश यादव ने मुझसे या मेरी पार्टी के लोगों से मिलकर कभी विचार-मंथन नहीं किया। हवाई किले बनाकर वह अकेले ही चुनाव जीतने जा रहे थे।

2022 में सपा की सीटें बढ़ीं और वोट प्रतिशत भी
ऐसा नहीं है कि 2022 के चुनावी नतीजे सपाइयों को हतोत्साहित करने वाले हैं। 2017 के मुकाबले 2022 में सपा की सीटें बढ़ी हैं और वोट प्रतिशत भी। 2017 में सपा को 47 सीटें मिली थीं, जबकि 2022 में अकेले दम पर सपा 111 सीटें जीतने में कामयार रही है। पिछचे चुनाव में सपा को 21.82 फीसदी वोट मिले थे जबकि 2022 में यह करीब 10 फीसदी बढ़कर 32.03 फीसदी हो गया जो सपा के इतिहास में अब तक सबसे ज्यादा है। फिर ऐसा क्या हुआ कि सपा-गठबंधन 125 सीटों पर ही सिमट गया? इस सवाल के जवाब में राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि सपा का मुकाबला उस बीजेपी से है, जो साल के 365 दिन चुनावी मोड में रहती है। बीजेपी ने एक ऐसी लाइन खींच दी है कि अगर आपको उन्हें सत्ता से बेदखल करना तो न केवल उनसे बेहतर होमवर्क करना होगा बल्कि उसे इम्पलीमेंट भी करना होगा। इसके अलावा सपा नेता जनता को यह विश्वास दिलाने में असफल रहे कि उनके पास बीजेपी से बेहतर प्लान है।

अब क्या करेंगे अखिलेश यादव?
पक्ष में माहौल होने के बावजूद 2022 में समाजवादी पार्टी क्यों चुनाव हार गई? आमतौर पर सपा नेता और कार्यकर्ता इस सवाल का रटा-रटाया जवाब देते हैं कि ईवीएम में खेल हुआ है। कोई भी यह बात क्यों नहीं करता कि आपने मेहनत कितनी की? याद नहीं पड़ता कि 2017 से 2020 तक अखिलेश यादव ने कब-कब जन आंदोलन किया? कब वह जनता के लिए सड़कों पर उतरे? जबकि 2012 में अखिलेश यादव ने गांव-गांव साइकिल दौड़ाकर सत्ता में आये थे। 2024 में सपा की सफलता भी इसी बात पर निर्भर करेगी कि इन दो वर्षों में अखिलेश यादव जमीन पर कितना सक्रिय रहते हैं। या फिर से ट्विटर-ट्विटर खेलते हैं।