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Shamshera Movie Review – रणबीर, वानी, संजय छाए, लेकिन कहानी ने किया निराश

दिल्ली. Shamshera Movie Review. निर्देशक करन मल्होत्रा की जब पहली फिल्म ‘अग्निपथ’ आई थी, तो उसने रिवेंज सागा जैसी मसाला फिल्मों को एक नई रुपरेखा दे दी थी। एक्शन इमोशन्स का ऐसा कॉकटेल थी वो फिल्म कि आज भी दर्शक उसे देखना पसंद करते हैं। फिर आई ‘ब्रदर्स’ जो वैसा जादू नहीं कर पाई थी, लेकिन करन मल्होत्रा के निर्देशन की तारीफ खूब हुई। और अब सात वर्ष बाद वो लाए हैं ‘शमशेरा’। रणबीर कपूर, वानी कपूर, संजय दत्त जैसे मंझे हुए कलाकारों से सजी यह फिल्म अंग्रेंजी हुकुमत के काल में सेट आजादी की जंग और फिरसे एक रिवेंज सागा है। तो क्या वो इस बार सफल हो पाए हैं। आईये जानते हैं।

क्या है कहानी-
कहानी है उस वक्त की जब अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा जमाया था और खमेरा जाति के लोगों के बुरे दिन शुरु हो गए थे। इनका सरदार था शमशेरा (रणबीर कपूर)। वो अंग्रेजों से एक सौदा करता है और बदले में उनसे अपनी जाति के लोगों की आजादी मांगता है, लेकिन दरोगा शुद्ध सिंह (संजय दत्त) शमशेरा से धोखा कर देता है। शमशेरा को उसी के लोगों को सामने भगौड़ा करार दिया जाता है व मार दिया जाता है। कहानी 25 साल आगे बढ़ती है। शमशेरा का बेटा बल्ली (रणबीर कपूर) अफसर बनना चाहता है, लेकिन इस बीच उसे अपने पिता के साथ हुई गद्दारी के बारे में पता चलता है और यहां से शुरु होता है उसका मिशन। यानी अपने लोगों को आजाद कराना व पिता की मौत का बदला लेना। क्य वो उसमें सफल होगा। इस सवाल का जवाब देती है फिल्म शमशेरा।

कैसा है निर्देशन-

फिल्म की ‘बाहुबली’ व ‘केजीएफ’ सरीखी साउथ फिल्मों से तुलना की जा सकती है। क्योंकि स्केल वैसा दिखता है। सेट्स पीसेसे व सिनेमेटोग्राफी लगभग वैसी ही है और वो खूबसूरत भी है। इन फिल्मों की तरह शमशेरा की कहानी भी प्रेडिक्टिबल है, लेकिन ये उन फिल्मों की कमजोरी नहीं थी। क्योंकि टिपिकल मसाला स्टोरी को वो नए स्टाइल में पेश करती थीं और इसमें सफल भी होती थीं। शमशेरा भी वैसी कोशिश करती हैं, लेकिन ये तुकड़ों में आपका मनोरंजन करती हैं। फिल्म में कई मौके हैं, जहां आप इसमें अपनी रुचि खोते हैं और फिर उससे जुड़ जाते हैं। खासतौर पर शुद्ध सिंह के लोगों पर अत्यातार वाले दृश्यों से, जहां आप भी क्रोधित होते हैं और बल्ली से इमोशनली जुड़ जाते हैं। पर वहीं इमोशनल कनेक्शन लगातार बन नहीं पाता। फिल्म का इस कारण रफ्तार धीमी और सुस्त पड़ जाती है। फिल्म की लगभग तीन घंटे की अवधि भी लंबी न लगती अगर ये इंटेंसिटी लगातार फिल्म में बनी रहती। करन मल्होत्रा की ही फिल्म ‘अग्नीपथ’ के साथ ऐसी दिक्कत नहीं थी। उसमें विजय शुरुआत से ही बदले की आग में जल रहा होता है और यह हमें उससे जुड़े रहने पर मजबूर करता है। इसलिए वो आज भी पसंदीदा फिल्मों में से एक हैं।

अभिनय कैसा है-

पर फिर भी फिल्म पूरी तरह खराब भी नहीं है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है। सेट्स खूबसूरत हैं। एक्शन सीक्वेंसेंस बढ़िया है। रणबीर-वानी की कैमेस्ट्री हॉट है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शानदार है। वहीं अभिनय की बात करें, तो रणबीर कपूर पहली दफा ऐसी मसाला फिल्म में नजर आए हैं और उन्होंने बढ़िया अभिनय किया है। इमोशनल सीन्स में उन्हें महारथ हासिल है ही और इस फिल्म में भी वो अपना जादू बिखेरने में सफल रहे हैं। वाणी कपूर केवल एक डांसर के रोल तक सीमित नहीं हैं। इंटरवल के बाद उनको कई सीन्स मिले हैं, जिनमें वो शानदार काम करती हैं। रॉनित रॉय, सौरभ शुक्ला, इरावती हर्षे को जितने-जितने सीन्स मिलते हैं उनके साथ वे न्याय करते हैं। लेकिन सब पर भारी पड़े हैं संजय दत्त। वो एक बार फिर निगेटिव रोल में छा गए हैं। कांचा, अधीरा के बाद इस फिल्म में शुद्ध सिंह के उनके रोल की तारीफ होगी। वो अपने कैरेक्टर के जरिए वो नफरत पैदा करने में सफल होते हैं, जिसकी जरूरत थी। जब-जब वो पर्दे पर आते हैं, फिल्म में जान आ जाती है। इसमें आपको उनके अग्निपथ के कांचा की झलक भी दिखेगी। पर उनका और रणबीर का क्लाइमेक्ट फाइट सीन बेहतर हो सकता है।

रेटिंग्स-

फिल्म को दिए जाते हैं तीन स्टार्स। कुल मिलाकर फिल्म एक बार देखी जा सकती है। हां, दक्षिण भारतीय फिल्मों से शमशेरा की तुलना न करें। शमशेरा की अपनी खूबियां हैं। और रणबीर कपूर और संजय दत्त के साथ फिल्म और बेहतर हो सकती थी।