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Turram Khan: आम बोलचाल की भाषा में बोला जाने वाला शब्द ‘तुर्रम खां’ के पीछे की कहानी जानिए,जिसे संसद में बोलने से किया गया है मना

लखनऊ. Turram Khan: हाल ही में भारत के संसद (राज्य सभा और लोक सभा) में ही जुमलाजीवी, बाल बुद्धि, सांड, शकुनि जैसे कई अन्य अमर्यादित शब्दों की लिस्ट पर बैन लगा दिया गया है| इसी लिस्ट में ‘तुर्रम खां’ भी शामिल था| जिसका उपयोग अकसर लोग बड़ी बहादुरी या शेखी बघारने के लिए करते हैं| लेकिन जब तुर्रम खान शब्द को हटाने की बात कही गयी तो गूगल पर इस शब्द का मतलब जाने के लिए लोग उत्सुक हो गए हैं कि आखिर इस शब्द से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है| आइये इसी सिलसिले को जारी रखते हुए हम आपको बताते हैं इसके पीछे की सारी कहानी और क्यों आपको गर्व महसूस होना चाहिए जब कोई अगली बार आपसे आपको ‘तुर्रम खां’ कहे-

1857 की क्रांति का हैदराबाद पर असर

हम सबने भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति (revolt of 1857) के बारे में पढ़ा है| इसी क्रांति की एक लहर हैदराबाद में भी उठी थी, जहां से इस शब्द की उत्पत्ति हुई| तुर्रम खान यानी ‘तुर्रेबाज खान’ हैदराबाद के बेगम बाजार में रहने वाले रूस्तम खान (Rustom Khan) के बेटे थे| तुर्रेबाज खान (Turrebaaz Khan) ने हैदराबाद (Hyderabad) में इस क्रांति के दौरान बहुत ही बहादुरी व असाधारण तरीके से अंग्रेजों के दांत खट्टे किये थे| लेकिन इतिहास को पलट अगर देखें तो तुर्रेबाज खान विद्रोह के साथ जन्मा और उसी में दफ़न हो गया| क्योकि इनके बारे में हमे ज्यादा जानकारी इतिहास में नहीं मिलती है और न ही इनका कोई स्केच या तस्वीर प्राप्त है|

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हैदराबाद के हीरो, तुर्रम खान

भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में तुर्रेबाज खान ने हैदराबाद में इस विद्रोह को अपने नेतृत्व में 5000 सैनिकों की फ़ौज के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ा| हैदराबाद में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्से की वजह थी ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) का हैदराबाद के निजाम के साथ संधि (alliance)| इस विद्रोह में तुर्रेबाज खान के साथ मौलवी अलाउद्दीन भी शामिल थे| जब दोनों लोग अपनी फ़ौज के साथ हैदराबाद की ब्रिटिश रेजीडेंसी (british residency) की तरफ कुछ कर रहे थे, तभी मंत्री मीर तुराब अली खान (mir turab ali khan) ने गद्दारी करते हुए इस बात की सूचना अंग्रेजों को दे दी| जब तुर्रेबाज खान अपनी फ़ौज के साथ रेजीडेंसी के अंदर पहुंचे तो उनका सामना ब्रिटिश मेजर कुडबर्ट डेविडसन और उनकी सेना से होती है| एक तरफ तलवार, लाठी-डंडे और अन्य मामूली हथियार होते हैं, वहीं दूसरी तरफ बंदूकों के साथ प्रशिक्षित सैनिक होते हैं| नतीजन तुर्रम खां की सेना हार एक लम्बे संघर्ष के बाद हार जाती है| जिसमे से कुछ लोग अपनी जान बचाकर भाग भी जाते हैं| तुर्रम खान भी भाग जाते हैं यह सोचकर की अगली बार और तैयारी के साथ आएंगे|

तुर्रम खान को सजा

22 जुलाई का दिन था जब अंग्रेजों ने तुराब अली खान द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार तुर्रेबाज खान को जंगल से गिरफ्तार कर लिया और आजीवन जेल में सजा काटने के लिए हैदराबाद कोर्ट ने ‘काला पानी की सजा’ (punishment of black water) का फैसला दिया| उन्हें पता था की इस सजा के बाद उन्हें अंडमान भेजा जायेगा, इसलिए वह 18 जुलाई 1859 को जेल से भाग गए| जिसके बाद अंग्रेजी सरकार ने उन पर 5000 रूपए का इनाम भी घोषित किया|

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इतिहासकारों की मानें तो उन्हें 24 जनवरी को जंगल में घेरकर पकड़ लिया गया था और गोली मार दी गयी थी| जिसके बाद उनके शव को पूरे शहर में घसीट कर घुमाया गया था| लेकिन कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उनके शव से कपडे हटा ब्रिटिश रेजीडेंसी के पास पेड़ से लटका दिया गया था| ताकि ऐसे अंजाम को देखकर कोई और ऐसा कुछ करने की हिम्मत ना जुटा पाए|

इस तरह तुर्रेबाज खान बहादुरी से अंग्रेजों का सामना करते अपने प्राण देशभक्ति में न्योछावर कर गए | इनकी याद में हैदराबाद में एक रोड का नाम इनके नाम पर रखा गया है और साथ ही एक मेमोरियल बनाया गया है जिस पर लिखा है ‘तुर्रेबाज खान’|

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