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Karmnasha River Myth : कर्मनाशा नदी का पानी भी छूने से डरते हैं लोग, जानें- इसे क्यों कहते हैं भारत की शापित नदी

गाजीपुर. Karmnasha River Myth- देश में नदियों को मां का दर्जा दिया जाता है। उनकी पूजा की जाती है। लेकिन, एक नदी ऐसी भी है, लोग जिसका पानी भी छूने से डरते हैं। हम बात कर रहे कर्मनाशा नदी की। कर्मनाशा नदी को भारत की शापित नदी कहा जाता है। कुछ लोग इसे भारत का शोक भी कहते हैं। लोग इस नदी को इतना अपवित्र मानते हैं कि इसका पानी तक छूने से डरते हैं। कर्मनाशा नदी बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच बहने वाली गंगा की उपनदी है। इस नदी कुल लंबाई करीब 190 किलोमीटर है। कर्मनाशा नदी का उद्गम स्थल बिहार का कैमूर जिला है। बिहार के बक्सर जिले के चौसा गांव में कर्मनाशा नदी गंगा नदी में मिल जाती है। इस नदी के बाईं ओर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, चंदौली, वाराणसी और गाजीपुर जिले हैं जबकि दाहिनी ओर बिहार के कैमूर और बक्सर जिले हैं।

Karmnasha Nadi को लेकर कई तरह के मिथक हैं। कई तरह के अंधविश्वास हैं। प्रसिद्ध लेखक डॉ. शिव प्रसाद तिवारी ने ‘कर्मनाशा की हार’ लिखकर सामाजिक रूढ़ियों पर तीखा कटाक्ष किया है, बावजूद बाहर से आये लोग कर्मनाशा नदी के पानी को छूने से बचते हैं। उनका मानना है कि इस नदी के पानी को छूने मात्र से उनके सभी कर्म-धर्म नष्ट हो जाते हैं। लेकिन यह सत्य नहीं है। The NH Zero की टीम खुद वहां पहुंची और पड़ताल की तो यह सभी मिथक झूठे साबित हुए। नदी के किनारे बसे लोग इसे ढकोसला करार देते हुए कहते हैं कि यह कर्मनाशा उनकी जीवनदायिनी नदी है। वे लोग सभी कामों में नदी के पानी का स्नान आदि में इस्तेमाल भी करते हैं। इसी पानी से खेतों में सिंचाई करते हैं। जानवरों को भी नदी का पानी पिलाते हैं।

Karmnasha River Myth
कर्मनाशा नदी दो शब्दों से मिलकर बना है। कर्म+नाश.. मतलब ऐसी नदी जिसका पानी छूने मात्र से लोगों के कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसको लेकर कई तरह कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि प्राचीन समय में कर्मनाशा नदी के किनारे रहने वाले लोग प्यासे रह जाते थे, लेकिन इस नदी का पानी इस्तेमाल नहीं करते थे। इसीलिए दूर-दराज से पहुंचे लोग इस नदी के पानी को छूने से भी डरते हैं।

Karmanasa River History
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के पिता सत्यव्रत सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। अपनी यह इच्छा उन्होंने गुरु वशिष्ठ को बताई, जिसे उन्होंने मना कर दिया। नाराज सत्यव्रत ब्रम्हर्षि विश्वामित्र के पास गये और सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा प्रकट की। वशिष्ठ और विश्वामित्र में शत्रुता थी, इसलिए विश्वामित्र ने कहा कि वह अपने तपोबल से सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग में भेज देंगे। मंत्रोच्चार के बाद सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग की ओर रवाना भी कर दिया। नाराज इंद्रदेव ने उन्हें उलटा लटकाकर धरती की ओर भेज दिया। लेकिन, विश्वामित्र भी कम जिद्दी नहीं थे। उन्होंने अपनी तपस्या के दम पर सत्यव्रत को स्वर्ग और धरती के बीच ही रोक दिया। नतीजन वह बीच में ही लटक गये और त्रिशंकु कहलाये।

राजा की लार से बन गई कर्मनाशा नदी
पौराणिक कथा के अनुसार, विश्वामित्र और देवताओं के युद्ध के चलते सत्यव्रत न तो स्वर्ग में जा सके और न ही धरती पर आ सके। उल्टे वह बीच में ही लटक रहे थे। इसके चलते उनके मुंह से तेजी से लार टपकने लगी जिसने धरती पर नदी का रूप ले लिया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषि वशिष्ठ ने राजा सत्यव्रत को चांडाल होने का शाप दे दिया था। नदी उनकी लार से बह रही थी, इसलिए इसे शापित कहा गया है। कालांतर में इस नदी का नाम कर्मनाशा नदी पड़ा।