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Indian Constitution and Encounter: एनकाउंटर पर क्या कहता है भारतीय संविधान? पुलिस की साख पर धब्बा हैं फर्जी एनकाउंटर

नई दिल्ली. Indian Constitution and Encounter- भारतीय संविधान किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं देता। न आम जनता को, न पुलिसवालों को और न ही किसी और को। बावजूद कई बार जरूरत न होते हुए भी पुलिस फैसला ऑन दि स्पॉट करने में भरोसा रखती है। कई मामलों में अपराधियों को कोर्ट-कचहरी में पेश करने की बजाय उनका एनकाउंटर कर दिया जाता है। हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर से रेप केस में भी ऐसा ही हुआ। लेकिन, पैरों तले से जमीन तब खिसक गई, जब पता चला कि यह एनकाउंटर फेक यानी फर्जी था। मतलब पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी बनाकर आरोपितों को मार गिराया था। ऐसे में सवाल तो बनता है कि आखिर कब तक यूं ही फेक एनकाउंटर होते रहेंगे? ऐसी मनोवृत्ति वाले पुलिसकर्मी कब सजा देने की बजाय न्यायालय से सजा दिलवाने में भरोसा करेंगे? क्योंकि ये फेक एनकाउंटर्स पुलिस के गौरवशाली इतिहास पर काला धब्बा हैं।

क्या था हैदराबाद एनकाउंटर केस
तेलंगाना के हैदराबाद में 26 नवंबर 2019 की रात को 27 साल की एक वेटनरी डॉक्टर दिशा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। महिला डॉक्टर का शव शादनगर में एक पुल के नीचे जली हुई अवस्था में मिला था। मामले में हैदराबाद पुलिस ने 04 लोगों को गिरफ्तार किया था। 06 दिसंबर को तड़के सुबह उनका एनकाउंटर कर दिया जाता है। पुलिस का दावा था कि क्राइम सीन पर ले जाते वक्त आरोपितों ने भागने की कोशिश की, जिसके बाद मुठभेड़ में उन्होंने मार गिराया गया। कुछ लोगों ने एनकाउंटर को त्वरित न्याय बताते हुए पुलिसवालों की तारीफ की थी। लेकिन, अब सुप्रीम कोर्ट के पैनल ने जांच करके दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। दरअसल, एनकाउंटर की जांच के लिए गठित जस्टिस सिरपुरकर आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें आरोपितों के एनकाउंटर को फर्जी करा दिया गया है। साथ ही कमेटी ने सिफारिश की ही है रेप और मर्डर के चार आरोपियों की हत्या के लिए 10 पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाए।

फर्जी एनकाउंटर पर उठते रहे हैं सवाल
यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी पुलिस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया गया है। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं, जिनमें जांच के बाद पुलिसिया कार्रवाई की पोल खुली। ऐसे में मामलों में कोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों को सख्त सजा सुनाई है। 18 सितंबर 1992 को पंजाब के अमृतसर में दो पुलिसवालों ने 15 साल के एक बच्चे का एनकाउंटर किया था। पुलिस का दावा था कि आरोपित ने पुलिस पर फायरिंग की थी। बाद में घटना की जांच के दौरान पाया गया कि ये एनकाउंटर फेक था। घटना के 26 साल बाद साल 2018 में कोर्ट ने दो पुलिसवालों को उम्रकैद की सजा सुनाई और 61 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था। देहरादून का रणवीर एनकाउंटर भी काफी सुर्खियों रहा था। इसी तरह से पीलीभीत फेक एनकाउंटर में स्पेशल कोर्ट ने 47 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा दी। साथ ही पद के अनुसार सभी पर अलग-अलग जुर्माना भी लगाया। 12 जुलाई 1991 को पुलिसवालों ने आतंकी बताकर 11 सिखों की हत्या की थी। ऐसे ही वर्ष 1997 में दिल्ली पुलिस ने दो उद्योगपतियों का फर्जी एनकाउंटर किया था।

Fake encounter and Indian Constitution

5 वर्षों में 655 पुलिस मुठभेड़
फरवरी 2021 में ही सरकार ने लोकसभा में बताया था कि पिछले पांच वर्षों में देश में कुल 655 पुलिस मुठभेड़-हत्याएं हुई हैं, जिसमें छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक 191, उत्तर प्रदेश में 117, असम में 50, झारखंड में 49, ओडिशा में 36 ऐसी घटनाएं हुई हैं। इसी अवधि के दौरान बिहार में मुठभेड़ की 22 घटनाएं हुई हैं। लेकिन, क्या कोई जानकार या संवेदनशील पुलिस अधिकारी यह दावा कर सकता है कि ये सभी मुठभेड़ की घटनाएं सही होंगी? क्योंकि इनमें से कई एनकाउंटर्स सवालों के घेरे में हैं। आइये अब इस पर भी बात कर लेते हैं कि क्या भारतीय संविधान में पुलिस को एनकाउंटर का अधिकार मिला है?

एनकाउंटर पर क्या कहता है भारतीय संविधान?
भारतीय संविधान में ‘एनकाउंटर’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं है। पुलिसिया भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब पुलिस और अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में अपराधियों की मौत हो जाती है। भारतीय कानून में एनकाउंटर कहीं भी वैध नहीं है। लेकिन, कुछ ऐसे नियम-कानून जरूर हैं जो पुलिस को अपराधियों पर हमला करने की ताकत देते हैं उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है। आमतौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का ज़िक्र ही करती है। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-कानून बनाए हुए हैं।

फर्जी मुठभेड़ों पर लगाम कब?
फर्जी मुठभेड़ में किसी को भी मारा जाना दुखद ही नहीं, बेहद शर्मनाक भी है। शासन-प्रशासन की वीरता इसमें हैं कि उनके कृत्य पूर्ण रूप से लोकहित और संविधान के दायरे में हो। राष्ट्र के विकास के लिए पुलिस को अनुशासित और दुनिया में गौरववान बनाना उतना ही अनिवार्य है, जितना कि आर्थिक विकास। ताकि फर्जी एनकाउंटर जैसी घटनाओं पर लगाम लगाई जा सके। क्योंकि इसमें कई बार निर्दोषों की जान चली जाती है जबकि दोषी आजाद रहता है। कोई भी सभ्य समाज फर्जी एनकाउंटर्स की उचित नहीं ठहरा सकता।