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अब भारत में भी सरोगेट मां का स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य, जानें- सरोगेसी के बारे में पूरी डिटेल

लखनऊ MTP Act 2022. देश में जनवरी 2022 से लागू कानून के नियमों के मुताबिक सरोगसी (किराये की कोख) के जरिये माता-पिता बनने वाले जोड़ों को सरोगेट मां का तीन वर्ष का स्वास्थ्य बीमा कराना अनिवार्य होगा| और यह बीमा की रकम गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद पैदा होने वाली मुश्किलों के इलाज के लिए पर्याप्त होनी चाहिए| साथ ही नियमों के मुताबिक गर्भ के चिकित्सिकीय समापन अधिनियम (MTP Act 1971) के प्रावधानों के तहत सरोगेट मां को गर्भपात (abortion) का भी अधिकार होगा| भारत में सरोगेसी का खर्च अन्य देशों के मुकाबले काफी सस्ता है, जिसके चलते देश-विदेश से आये लोग भारतीय महिलाओं को ज्यादा प्रेफरेंस देते हैं| ऐसे में कई बार सरोगेट मां को स्वास्थय सम्बन्धी समस्याएं झेलनी पड़ती है| इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने नया नियम लागू किया है| आइये जानते है विस्तार में इसके बारे में –

नया नियम क्या कहता है?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से 21 जून को भारत के राजपत्र में प्रकाशित सरोगेसी अधिनियम,2021 के मुताबिक सरोगेट मां सरोगसी प्रक्रिया से तीन से ज्यादा बार नहीं गुजर सकती और न ही एक बार में तीन से अधिक भ्रूण (embryo) कोख में नहीं रखे जा सकते|

सरोगेसी का मतलब क्या होता है? (surrogacy)
सरोगेसी (किराये की कोख) में एक महिला किसी और के बच्चे को अपनी कोख से जन्म देती है उन महिलाओं के लिए जिनके गर्भाशय में प्राकृतिक कमी या जोखिम भरे गर्भावस्था के कारण भ्रूण का पूरा विकास नहीं हो पाता है।बच्चे के जन्म के बाद जन्म देने वाली सरोगेट माँ इच्छित माता-पिता या माता-पिता को अभिरक्षा और संरक्षकता (Custody and Guardianship) प्रदान करती है।

सरोगसी में बच्चे का जन्म कैसे होता है?
इस प्रक्रिया में बच्चा पैदा करने के लिए जब कोई कपल किसी दूसरी महिला की कोख किराए पर लेता है, तब वह सरोगेट महिला अपने या फिर डोनर के एग्स के जरिए प्रेग्नेंट होती है और बच्चे को जन्म देती है|

सरोगसी में कितना खर्च आता है?
विदेशों के मुकाबले भारत में सरोगेसी का खर्च सबसे सस्ता है , यह खर्च करीब 10 से 25 लाख रुपये के बीच आता है| जबकि विदेशों में इसका खर्च करीब 60 लाख रुपये तक आ जाता है।

सरोगेसी के प्रकार
सरोगेसी दो प्रकार की होती है। पहली ट्रेडिशनल सरोगेसी और दूसरी जेस्टेशनल सरोगेसी। ट्रेडिशनल सरोगेसी में पिता या डोनर के शुक्राणुओं को सरोगेट मदर के अंडाणुओं से मिलाया जाता है। इस प्रकिया में बच्चे की बॉयोलॉजिकल मदर (जैविक मां) सरोगेट मदर ही होती है। हालांकि इसमें बच्चे के जन्म के बाद उस पर पूरा अधिकार उस कपल का ही होता है, जिसने सरोगेसी करवाई है।

जेस्टेशनल सरोगेसी में पिता के शुक्राणुओं (sperms) और माता के अंडाणुओं को मिलाकर सरोगेट मदर की बच्चेदानी में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इस प्रकिया में सरोगेट मदर सिर्फ बच्चे को जन्म देती है। इसमें बच्चे का सरोगेट मदर से किसी भी तरह से जेनेटिकली संबंध नहीं होता है। बच्चे की जैविक मां सरोगेसी करवाने वाली महिला ही होती है।